Class 9 Hindi Chapter 3 Kabir Question Answer | कबीर कक्षा ९वी हिंदी स्वाध्याय

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Class 9 Hindi Chapter 3 Kabir Question Answer | कबीर कक्षा ९वी हिंदी स्वाध्याय

पठनीय

संत कबीर जी के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए तथा कक्षा में उसका वाचन कीजिए।

उत्तर:

महान समाज सुधारक: संत कबीरदास

            आदरणीय शिक्षक गण और मेरे प्यारे सहपाठियों, आज मुझे आपके सामने भारत के महान संत, कवि और समाज सुधारक संत कबीरदास जी के बारे में बोलने का अवसर मिला है।

१. जन्म और प्रारंभिक जीवन

            संत कबीरदास जी का जन्म १५वीं शताब्दी के आसपास काशी (वाराणसी) में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि उनका पालन-पोषण 'नीरू' और 'नीमा' नाम के एक जुलाहा (कपड़ा बुनने वाले) दंपत्ति ने किया था। कबीर जी ने किताबी शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, वे खुद कहते थे— "मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ"। उन्होंने समाज को देखकर और अपने अनुभवों से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त किया। वे प्रसिद्ध संत स्वामी रामानंद के शिष्य बने।

२. मुख्य विचार और संदेश

कबीर दास जी ने समाज में फैली बुराइयों, अंधविश्वासों और जाति-पाति के भेदभाव का कड़ा विरोध किया। उनके विचार बहुत सीधे और सच्चे थे:

·           ईश्वर एक है: उन्होंने बताया कि भगवान किसी एक धर्म या जाति के नहीं हैं। वे हर मनुष्य के हृदय में वास करते हैं।

·           सच्ची मानवता: उनके लिए कर्म ही पूजा थी। उन्होंने लोगों को आपस में प्रेम और भाईचारे से रहने की सीख दी।

·           सरल भाषा: उन्होंने अपनी बात को सामान्य जनता की भाषा (सधुक्कड़ी/पंचमेल खिचड़ी) में कहा, ताकि हर कोई उसे आसानी से समझ सके।

३. प्रमुख रचनाएँ

कबीर जी जो भी गाते या बोलते थे, उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। उनकी रचनाओं के मुख्य रूप से तीन भाग हैं, जिन्हें 'बीजक' कहा जाता है:

1.    साखी: इसमें ज्ञान और नीति की बातें हैं (दोहे के रूप में)।

2.    सब्द (पद): ये संगीतमय पद हैं जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम व्यक्त किया गया है।

3.    रमैनी: इसमें कबीर जी के दार्शनिक विचार चौपाई के रूप में मिलते हैं।

 

४. कक्षा के लिए कबीर जी के दो प्रसिद्ध दोहे (अर्थ सहित)

वाचन के दौरान आप इन दोहों को बोलकर उनका अर्थ समझा सकते हैं:

दोहा: पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होइ॥

अर्थ: बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बनता, बल्कि जो इंसान मानवता और प्रेम का सही मतलब समझता है, वही असली ज्ञानी है।

 

दोहा: बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोइ।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोइ॥

अर्थ: जब मैं दुनिया में कमियाँ ढूंढने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला, लेकिन जब मैंने अपने अंदर झाँक कर देखा तो पाया कि सबसे ज़्यादा सुधार की ज़रूरत तो मुझे खुद के अंदर ही है।

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३. कबीर स्वाध्याय  | कबीर के प्रश्न उत्तर

सूचना के अनुसार कृतियाँ :-

(१) संजाल :




 उत्तर:


 


(२) परिच्छेद पढ़कर प्राप्त होने वाली प्रेरणा लिखिए :

चाहे कोई देश हो या चाहे कोई व्यक्ति, प्रत्येक को सफलता के लिए अलग माप-जोख की आवश्यकता होती है। कोई देश या कोई व्यक्ति अपनी सफलता के लिए जो पैमाना निर्धारित करता है, यह जरुरी नहीं कि वही पैमाना दुसरे के लिए भी उपयोगी साबित हो। इसलिए प्रत्येक देश और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आवश्यकता और क्षमता के अनुसार अपनी सफलता के लिए विशिष्ट पैमाना निर्धारित करना चाहिए। सफलता तभी प्राप्त की जा सकती है।

 

उत्तर:

 

प्राप्त होने वाली प्रेरणा:

इस परिच्छेद से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि प्रत्येक व्यक्ति और देश की क्षमताएँ, परिस्थितियाँ और आवश्यकताएँ भिन्न होती हैं। इसलिए हमें सफलता के लिए दूसरों के पैमानों या उनकी नकल करने के बजाय अपनी खुद की क्षमता और आवश्यकता के अनुसार अपने लक्ष्य और पैमाने तय करने चाहिए। दूसरों से अंधाधुंध तुलना करने के बजाय अपनी विशिष्ट योग्यताओं को पहचानकर प्रयास करने से ही वास्तविक सफलता प्राप्त की जा सकती है।

 

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श्रवणीय


किसी संत कवि के दोहे तथा पद सुनिए।

उत्तर:

 

कबीरदास जी का प्रसिद्ध पद

 

"मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में। ना तीरथ में,

ना मूरत में, ना एकान्त निवास में॥

ना मन्दिर में, ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में।

ना तो कौने क्रिया-कर्म में, ना ही जोग सन्यास में॥

खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तालास में।

 कहै कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वांसों की स्वांस में॥"

 

लेखनीय

'कबीर संत ही नहीं समाज सुधारक भी थे' इस विषय पर विचार लिखिए।

उत्तर:

संत कबीर का नाम संत कवियों में सर्वोपरि लिया जाता है। कबीर ने ईश्वर एवं ईश्वर-भक्ति पर तो लिखा ही है, साथ ही उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों और विषमताओं पर गहरी चोट की है। कबीर के काल में समाज में अनेक विकृतियाँ फैली हुई थीं और तरह-तरह के अंधविश्वास प्रचलित थे। कबीर ने इन सब का जोरदार विरोध किया।

वे सामान्य जनता से सीधे जुड़े हुए थे। समाज में व्याप्त सभी बुराइयों, जैसे- जाति-पाति का भेद, छुआछूत और बाह्याडंबरों पर उन्होंने बिना लाग-लपेट के सीधा प्रहार किया। इस तरह कबीर ने अपने काव्य और वाणी के माध्यम से समाज-सुधारक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसलिए उन्हें केवल एक संत कहना पर्याप्त नहीं होगा, वे एक महान समाज सुधारक भी थे।


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संभाषणीय

दोहों की प्रतियोगिता के संदर्भ में आपस में चर्चा कीजिए।

उत्तर:

दोहा प्रतियोगिता के संदर्भ में दो मित्रों का संवाद

पात्र: राहुल और अमित (कक्षा नौवीं के छात्र)

राहुल: अरे अमित! क्या तुमने स्कूल के नोटिस बोर्ड पर लगी नई सूचना पढ़ी? अगले हफ्ते हमारे स्कूल में हिंदी 'दोहा वाचन प्रतियोगिता' होने जा रही है।

अमित: हाँ राहुल, मैंने भी अभी-अभी वह नोटिस देखा। मैं तो सोच रहा हूँ कि इस प्रतियोगिता में भाग ज़रूर लूँ। वैसे भी हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में हमने संत कबीरदास जी के कई ज्ञानवर्धक दोहे और उनकी विशेषताएँ पढ़ी हैं

राहुल: बिल्कुल सही कहा! लेकिन प्रतियोगिता के नियम क्या हैं, क्या तुमने ध्यान से पढ़ा?

अमित: हाँ, नियमों के अनुसार प्रत्येक छात्र को कोई भी तीन प्रसिद्ध दोहे सुनाने होंगे। सिर्फ दोहा बोलना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके साथ उसका सरल अर्थ और उससे मिलने वाली जीवन की सीख भी बतानी होगी। इसके लिए कुल तीन मिनट का समय मिलेगा।

राहुल: यह तो बहुत बढ़िया है! दोहे सुनाने से हमारी हिंदी भाषा और उच्चारण तो सुधरते ही हैं, साथ ही हमारी याद रखने की क्षमता भी बढ़ती है। तुम कौन-से संतों के दोहे चुनने वाले हो?

अमित: मैं संत कबीर और गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे चुनने की सोच रहा हूँ। कबीरदास जी के दोहे सीधे दिल को छूते हैं और समाज सुधार का संदेश देते हैं, जैसे उनका वह प्रसिद्ध दोहा है— "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ..."

राहुल: वाह! यह तो बहुत ही सुंदर दोहा है। मैं इस प्रतियोगिता के लिए संत रहीमदास जी के नीतिपरक दोहे याद करूँगा। रहीम जी के दोहे हमें व्यवहारिक जीवन में कैसे जीना चाहिए, यह सिखाते हैं। जैसे— "रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय..."

अमित: बहुत अच्छे राहुल! अच्छा सुनो, प्रतियोगिता में अच्छे अंक पाने के लिए हमें दोहों को पूरे सुर, ताल और स्पष्ट आवाज़ (उच्चारण) में गाना होगा। इसके लिए हमें रोज़ घर पर थोड़ा अभ्यास करना चाहिए।

राहुल: हाँ अमित, सही कहा। चलो, आज से ही हम दोनों अलग-अलग संतों के अच्छे-अच्छे दोहे ढूँढ़कर उन्हें याद करना और उनके अर्थ को समझना शुरू कर देते हैं। इस बहाने हमारी प्रतियोगिता की तैयारी भी साथ-साथ हो जाएगी।

अमित: बिल्कुल सही! चलो, लाइब्रेरी की तरफ चलते हैं और कुछ अच्छी किताबें देखते हैं।

 

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मौलिक सृजन

'संतों के वचन समाज परिवर्तन में सहायक होते हैं' इस विषय पर अपने विचार लिखिए।

उत्तर:

हमारे देश में अनेक महान संत हुए हैं, जिन्होंने अपने काव्यों, अपने साहित्य तथा अपने व्याख्यानों के माध्यम से समाज के लोगों में जागरूकता लाने और समाज परिवर्तन का काम किया है। संत कबीर का नाम इसमें सर्वोपरि है। इन्होंने तीर्थक्षेत्रों, पूजा-पाठ, व्रत आदि बाह्याडंबरों को महत्त्व न देकर अपनी सरल और तीखी वाणी से समाज में सुधार लाने का प्रयास किया। उन्होंने सत्य को ही ईश्वर माना और कहा कि राम-रहीम दोनों एक ही हैं।

कबीर के साथ-साथ गुरु नानक देव, कर्नाटक के संत बसवेश्वर, बंगाल के चैतन्य महाप्रभु, गुजरात के संत नरसी मेहता तथा महाराष्ट्र के संत नामदेव, संत एकनाथ, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम तथा संत रामदास स्वामी जैसे अनेक संतों ने लोगों को समानता और मानवधर्म की सच्ची शिक्षा दी। इन सभी संतों ने लोगों में एकता की भावना पैदा करने और एक-दूसरे से हिल-मिल कर प्रेमपूर्वक रहने का संदेश दिया। संतों के उपदेश सीधे जनमानस के हृदय को छूते हैं, जो रूढ़ियों को तोड़कर एक स्वस्थ समाज के निर्माण में मार्गदर्शक बनते हैं। अतः संतों के वचन समाज परिवर्तन में अत्यंत सहायक सिद्ध होते हैं।

आसपास

मन की एकाग्रता बढ़ाने की कार्य पद्धति की जानकारी अंतरजाल/यू ट्यूब से प्राप्त कीजिए।

उत्तर:

मन की एकाग्रता (Concentration) बढ़ाने के प्रमुख तरीके संक्षेप में नीचे दिए गए हैं:

 

पोमोडोरो तकनीक (Pomodoro): २५ मिनट पूरी एकाग्रता से पढ़ाई/काम करें, फिर ५ मिनट का ब्रेक लें।

श्वास पर ध्यान (Meditation): रोज १० मिनट आँखें बंद करके अपनी साँसों पर ध्यान केंद्रित करें।

डिजिटल डिटॉक्स: काम के समय मोबाइल को साइलेंट रखें या दूसरे कमरे में रखें ताकि ध्यान न भटके।

सिंगल-टास्किंग: एक समय में केवल एक ही काम करें; मल्टीटास्किंग से बचें।

स्पष्ट कार्य सूची (To-Do List): दिनभर के कामों को छोटे हिस्सों में बांटकर एक लिस्ट तैयार करें।

अच्छी जीवनशैली: ७-८ घंटे की पर्याप्त नींद लें, भरपूर पानी पीएँ और प्राणायाम करें।

 

पाठ के आंगन में

संजाल :


(१) सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए


उत्तर:
 

 

(२) सही विकल्प चुनकर वाक्य फिर से लिखिए :-


(क) कबीर के मतानुसार प्रेम किसी,...........

१. खेत में नहीं उपजता।

२. गमले में नहीं उपजता।

३. बाग में नहीं उपजता।

उत्तर: कबीर के मतानुसार प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता

 

(ख) कबीर जिज्ञासु थे,...........

१. मिथ्या के।

२. सत्य के

३. कथ्य के।

उत्तर: कबीर जिज्ञासु थे, सत्य के

पाठ से आगे

कबीर जी की रचनाएँ यू ट्यूब पर सुनिए।


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भाषा बिंदु


रेखांकित शब्दों से उपसर्ग और प्रत्यय अलग करके लिखिए :

 

१. भारत की अलौकिकता सारे विश्व में फैली है।

उपसर्ग: अ

मूल शब्द: लौकिक

प्रत्यय: ता

 

२. फक्कड़ना लापरवाही और निर्मम अक्खड़ता उनके आत्मविश्वास का परिणाम थी।

उपसर्ग: ला

मूल शब्द: परवाह

प्रत्यय: ई

 

३. लोग उनकी असफलता पर क्या-क्या टिप्पणी करेंगे।

उपसर्ग: अ

मूल शब्द: सफल

प्रत्यय: ता

 

४. राजेश अभिमानी लड़का है।

उपसर्ग: अभि

मूल शब्द: मान

प्रत्यय: ई

 

5. मोह-ममता उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती थी।

उपसर्ग: वि

मूल शब्द: चल

प्रत्यय: इत

 

६. केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है, तुलसीदास।

उपसर्ग: प्रति

मूल शब्द: द्वंद्व

प्रत्यय: ई

 

७. पूर्णिमा के दिन चाँद परिपूर्णता लिए हुए था।

उपसर्ग: परि

मूल शब्द: पूर्ण

प्रत्यय: ता


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